
वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के नालंदा भवन के सभागार में आज कथाकार शिव प्रसाद सिंह स्मृति संगोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तिब्बती संस्थान के कुलपति प्रो.डब्लू. डी. नेगी ने कहा कि साहित्य का मुख्य उद्देश्य होता है मनुष्यता को स्थापित करना, संवेदना को स्थापित करना। शिव प्रसाद सिंह के साहित्य में ग्रामीण अंचल की जो झलक मिलती है वह कथाकार प्रेमचंद का स्मरण कराती है। मुख्य अतिथि के रूप में नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री श्री व्योमकेश शुक्ल ने कहा शिव प्रसाद सिंह ने अपनी रचनाओं के नायक अपने ही समाज से चुने थे। उन्होंने कहा कि डॉ शिव प्रसाद सिंह आज के लेखक हैं।नागरी प्रचारिणी सभा के नियमन को सही ढंग से चलने के लिए जो ज्ञापन तैयार किया गया था उसको रूप देने वाले डॉ .शिव प्रसाद सिंह जी ही थे। मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि डॉ.शिव प्रसाद सिंह केवल कथाकार ही नहीं थे वरन एक बड़े मनुष्य एवं सामाजिक चिंतक भी थे।आजादी के बाद के हिंदुस्तान को समग्रता में एक साथ देखना हो तो उनके उपन्यास अलग-अलग बैतरणी से बेहतर कोई माध्यम हो ही नहीं सकता है। उनके अन्य उपन्यास नीला-चांद और वैश्वानर अपने सामयिक जीवन को पूरी तरह प्रेषित करता है।मुख्य वक्ता के रूप में प्राख्यात साहित्यकार प्रो. राम सुधार सिंह ने कहा कि शिव प्रसाद सिंह आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक और रचनाकार हैं। बड़ा साहित्यकार होने के लिए बड़ा मनुष्य होना जरूरी है। डॉ. शिव प्रसाद सिंह ने जीवन भर अपने तमाम विरोधों से टकराते हुए साहित्य की रचना की।प्रोफेसर श्रद्धानंद ने कहा कि जिस साहित्यकार में जितनी समग्रता हो सकती है वह उतना ही बड़ा रचनाकार होता है, इस लिहाज से डॉ. शिव प्रसाद सिंह समग्रता के रचनाकार हैं। उन्होंने कहा कि जो रचनाकार प्रेम के तरंगों में डूबता है वह समस्त रूप में व्यक्त होता है। इसीलिए डॉ. शिव प्रसाद सिंह का शोध- प्रबंध “सूर पूर्व ब्रजभाषा और साहित्य” हिंदी साहित्य में अप्रतिम है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ.ज्योति सिंह ने, स्वागत अनुराग त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के मीडिया प्रभारी डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किया। कार्यक्रम का संयोजन प्रोफेसर उमेश प्रसाद सिंह ने किया। इस अवसर पर डॉ. अभिजीत गुप्ता, डॉ. अनिल गुप्ता, डॉ. किशन शुक्ला,अमित सहित छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
