
जानिए महत्व, पूजा विधि, व्रत के नियम और शुभ मुहूर्त
“नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की…हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की…”
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आज शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जा रही है। इस दिन भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी।
“जन्माष्टमी का महत्व”
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में अत्याचारी कंस के कारागार में आधी रात के समय हुआ था। श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए अवतार लिया।गीता में भगवान कृष्ण का प्रसिद्ध संदेश है—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…” जन्माष्टमी का संदेश केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, प्रेम, करुणा और कर्तव्य के मार्ग पर चलना भी है। जन्माष्टमी के दिन भक्त प्रातः स्नान करके भगवान कृष्ण के सामने व्रत का संकल्प लेते हैं। घर के मंदिर में लड्डू गोपाल की प्रतिमा को सजाया जाता है। दिनभर व्रत रखते हुए भगवान कृष्ण का स्मरण, भजन और कीर्तन किया जाता है। रात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा की जाती है। लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उन्हें झूले में विराजमान कराया जाता है।पूजा में सामान्यतः ये सामग्री रखी जाती है: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और मिश्री), माखन-मिश्री, फल एवं मिठाई, तुलसी दल, फूल एवं माला, धूप-दीप, पीले वस्त्र तथा भगवान कृष्ण का झूला।

“पूजा का शुभ मुहूर्त”
‘निशीथ पूजा मुहूर्त’: रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक, यानी जन्माष्टमी की मुख्य पूजा 4 सितंबर की रात से 5 सितंबर की मध्यरात्रि में की जाएगी।
‘रोहिणी नक्षत्र’: 4 सितंबर को लगभग रात 12:29 बजे से 11:04 बजे तक रहेगा।
“व्रत और पारण”
कई भक्त जन्माष्टमी पर निर्जल या फलाहार व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म के बाद पूजा करके व्रत खोलते हैं। पारण की परंपरा अलग-अलग संप्रदाय और स्थान के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए अपने परिवार या संप्रदाय की परंपरा तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण करना उचित है।
“जन्माष्टमी पर क्या करें?”
भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री और तुलसी दल अर्पित करें।“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें। कृष्ण जन्म की कथा सुनें।रात्रि में भजन-कीर्तन करें।

“भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा”
द्वापर युग का समय था। मथुरा नगरी पर राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। कंस अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था और उसके भय से पूरा राज्य कांपता था।एक दिन कंस अपनी प्रिय बहन देवकी का विवाह वसुदेव जी के साथ कराकर उन्हें विदा कर रहा था। तभी आकाशवाणी हुई—“हे कंस! जिस देवकी को तुम इतने प्रेम से विदा कर रहे हो, उसी की आठवीं संतान तुम्हारे वध का कारण बनेगी।”
यह सुनते ही कंस क्रोधित हो गया और उसने देवकी का वध करने के लिए तलवार उठा ली। वसुदेव जी ने कंस को समझाया कि देवकी से उसे कोई भय नहीं है। उन्होंने वचन दिया कि देवकी की प्रत्येक संतान को वह कंस के हवाले कर देंगे।
कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में बंद कर दिया। समय बीतता गया और देवकी की एक-एक करके संतानें जन्म लेने लगीं। कंस ने उनकी छह संतानों को निर्दयता से मार डाला।सातवीं संतान के रूप में भगवान शेषनाग के अवतार बलराम जी देवकी के गर्भ में आए। भगवान की योगमाया ने उन्हें देवकी के गर्भ से निकालकर वसुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया। इसलिए बलराम जी को संकर्षण भी कहा जाता है।अब देवकी की आठवीं संतान का समय आया।
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। चारों ओर अंधकार था और मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव जी भगवान का स्मरण कर रहे थे।मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया।जन्म लेते ही कारागार दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो उठा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान ने चतुर्भुज रूप में माता-पिता को दर्शन दिए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे।

भगवान ने देवकी और वसुदेव से कहा कि वे उन्हें गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के घर पहुंचा दें, जहां उसी समय एक कन्या का जन्म हुआ है। भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया कि यह कन्या कंस के हाथों नहीं मारी जाएगी।भगवान की लीला से कारागार के सभी प्रहरी गहरी नींद में सो गए। कारागार के दरवाजे और बेड़ियां अपने आप खुल गईं।वसुदेव जी ने नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखा और आधी रात को उन्हें लेकर गोकुल की ओर चल पड़े।रास्ते में यमुना नदी उफान पर थी। वसुदेव जी जैसे ही यमुना में उतरे, नदी का जल बढ़ने लगा। तभी भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए शेषनाग ने अपना फन फैलाकर छत्र बना दिया।
वसुदेव जी किसी तरह यमुना पार करके गोकुल पहुंचे।गोकुल में उस समय यशोदा माता प्रसव के बाद अचेत अवस्था में थीं। उनके पास एक कन्या थी।वसुदेव जी ने श्रीकृष्ण को यशोदा माता के पास सुला दिया और उस कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए।
जैसे ही कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला, वह कारागार में पहुंच गया।कंस ने उस कन्या को पत्थर पर पटकने के लिए उठाया, लेकिन वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हुई। देवी ने कंस से कहा—“हे कंस! तेरा वध करने वाला जन्म ले चुका है और वह इस समय गोकुल में है।”
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया।उधर गोकुल में नंद बाबा के घर बालक कृष्ण के जन्म की खबर फैलते ही चारों ओर आनंद छा गया।नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!गोप-गोपियां खुशी से झूम उठे। घर-घर उत्सव मनाया गया। माता यशोदा अपने लल्ला को देखकर निहाल हो गईं।यही बालक आगे चलकर कंस का अंत, धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रसिद्ध हुए।
“कृष्ण जन्म कथा का संदेश”
श्रीकृष्ण जन्म की कथा हमें यह संदेश देती है कि जब अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर का अवतार होता है। अंधकार कितना भी गहरा हो, सत्य और धर्म का प्रकाश अंततः विजय प्राप्त करता है।
विशेष संदेश भी यही है कि “जब जीवन में अंधकार बढ़ता है, तब आशा, सत्य और धर्म का प्रकाश अवश्य प्रकट होता है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, बुद्धि, कर्म और धर्म का अद्भुत संगम है।”
“नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की…हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की…”
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
**जय श्रीकृष्ण! राधे-राधे!**
