
वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर की अनोखी परंपरा जानिए, जहां भगवान शिव के शिवलिंग का 24 घंटे और साल के 365 दिन लगातार जलाभिषेक होता है.
आमतौर पर देश के ज्यादातर मंदिरों में दर्शन और पूजा के लिए तय समय होता है. सुबह कपाट खुलते हैं और रात में बंद हो जाते हैं लेकिन भगवान शिव का एक ऐसा प्रसिद्ध धाम भी है, जहां न तो भक्ति का प्रवाह थमता है और न ही जलाभिषेक का क्रम. उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ के शिवलिंग पर साल के 365 दिन और दिन-रात 24 घंटे जल चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है. यही परंपरा इस मंदिर को देश के सबसे अनूठे शिवधामों में शामिल करती है.

“द्वादश ज्योतिर्लिंगों में है विशेष स्थान”
काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है. धार्मिक ग्रंथों में काशी को भगवान शिव की प्रिय नगरी बताया गया है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ स्वयं इस नगरी की रक्षा करते हैं और यहां आने वाले भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं. यही कारण है कि हर दिन हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान इसकी अखंड जलाभिषेक परंपरा है. सुबह की मंगला आरती से पहले शुरू होने वाला पूजन पूरे दिन चलता रहता है. श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री भगवान शिव को अर्पित करते हैं. मंदिर परिसर में किसी न किसी श्रद्धालु का जलाभिषेक लगातार चलता रहता है, इसलिए यहां शिवलिंग कभी सूना नहीं दिखाई देता.

“आधी रात में भी उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़”
काशी विश्वनाथ मंदिर की रौनक केवल दिन तक सीमित नहीं रहती. देर रात और तड़के सुबह भी भक्त बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. कई श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में जलाभिषेक को विशेष फलदायी मानते हैं, इसलिए रात के अंतिम पहर में भी मंदिर परिसर में ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष सुनाई देते हैं. यही दृश्य इस धाम को अन्य मंदिरों से अलग बनाता है. काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है. समय-समय पर इस मंदिर ने कई ऐतिहासिक बदलाव देखे, लेकिन भगवान शिव की आराधना और जलाभिषेक की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई. मंदिर का वर्तमान स्वरूप बनने के बाद भी यह परंपरा उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ती रही. शिवभक्तों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है.
“महामारी के दौर में भी जारी रही नित्य पूजा”
कोरोना महामारी के दौरान जब देश के अधिकांश मंदिरों में आम लोगों का प्रवेश रोक दिया गया था, तब भी काशी विश्वनाथ मंदिर में नित्य पूजा और जलाभिषेक की परंपरा जारी रही. मंदिर के पुजारियों ने निर्धारित नियमों के अनुसार भगवान शिव की नियमित सेवा की. इससे यह परंपरा एक बार फिर चर्चा में आई कि परिस्थितियां कैसी भी हों, बाबा विश्वनाथ की दैनिक पूजा नहीं रुकती.
“क्यों खास है यह परंपरा?”
श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान शिव को जल अर्पित करना सबसे सरल और श्रेष्ठ उपासना मानी जाती है. काशी विश्वनाथ मंदिर में निरंतर होने वाला जलाभिषेक इसी अटूट श्रद्धा का प्रतीक है. यही वजह है कि यहां हर समय किसी न किसी भक्त के हाथों से गंगाजल शिवलिंग पर चढ़ता रहता है. भक्ति का यह अखंड प्रवाह ही काशी विश्वनाथ को देश के सबसे जाग्रत और विशेष शिवधामों में स्थान दिलाता है.
