
यह कथा काशी और अघोर परंपरा में प्रचलित जनश्रुतियों में से एक मानी जाती है। कहते हैं कि संत रविदास की एक अत्यंत धर्मपरायण पुत्री थी। वह बचपन से ही ईश्वर-भक्ति और सेवा में लीन रहती थी। जब उसके विवाह का समय आया, तो उसका विवाह सिंध–बलूच क्षेत्र के एक धार्मिक परिवार में हुआ। विवाह के बाद वह उस क्षेत्र में रहने लगी, जहां से प्रसिद्ध हिंगलाज माता के मंदिर की यात्रा की जाती थी।लोककथा के अनुसार, संत रविदास ने अपनी पुत्री को विदा करते समय कहा, “जहां भी रहो, सेवा, सत्य और भक्ति कभी मत छोड़ना। माता स्वयं तुम्हारी रक्षा करेंगी।”समय बीतता गया। एक दिन संत रविदास की पुत्री ने हिंगलाज माता की कठिन यात्रा का संकल्प लिया। कठिन रेगिस्तानी मार्ग, पर्वत और निर्जन प्रदेश पार करते हुए वह माता के दरबार पहुंची और अखंड भक्ति से उनकी आराधना की। कहा जाता है कि माता ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी भक्ति की महिमा युगों तक गाई जाएगी।उधर कई वर्षों बाद अघोर परंपरा के महान संत बाबा कीनाराम भी अपनी साधना के क्रम में हिंगलाज माता के दर्शन के लिए पहुंचे। जनश्रुति है कि वहां उन्हें एक दिव्य अनुभूति हुई। माता ने उन्हें संकेत दिया कि सच्चा साधक वही है, जो सभी मनुष्यों में ईश्वर का दर्शन करे।कथा में आगे कहा जाता है कि बाबा कीनाराम ने वहां संत रविदास की पुत्री की भक्ति और सेवा की चर्चा सुनी। उन्होंने समझा कि संत रविदास की शिक्षा केवल काशी तक सीमित नहीं रही, बल्कि दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। यह सुनकर उन्होंने संत रविदास के समता और मानवता के संदेश को प्रणाम किया।कथा का संदेश यह है कि भक्ति किसी स्थान, जाति या परंपरा की सीमा में बंधी नहीं होती। चाहे मार्ग संत रविदास का समता और सेवा का हो या बाबा कीनाराम का अघोर साधना का, दोनों अंततः मानवता, करुणा और ईश्वर से एकत्व की ओर ले जाते हैं।इस लोककथा में हिंगलाज माता शक्ति, संत रविदास सेवा और समता, तथा बाबा कीनाराम निर्भय साधना और आत्मज्ञान के प्रतीक बनकर सामने आते हैं।
