
स्वर परीक्षा में पांच स्वरूपों का चयन, श्रीराम की भूमिका निभाएंगे उज्ज्वल मिश्रा
वाराणसी। धर्म और आस्था की नगरी काशी में करीब 150 वर्ष पुरानी शिवपुर की ऐतिहासिक रामलीला की तैयारियां शुरू हो गई हैं। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर 25 सितंबर से रामलीला का भव्य आयोजन प्रारंभ होगा, जो लगातार 33 दिनों तक चलेगा। रामलीला समिति की ओर से आयोजन को सफल बनाने के लिए तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।रामलीला के स्वरूपों के चयन के लिए रविवार को स्वर परीक्षा आयोजित की गई। इसमें कई बालकों ने प्रतिभाग किया। प्रतिभागियों से संस्कृत के श्लोकों और रामचरितमानस की चौपाइयों का सस्वर पाठ कराया गया। स्वर की मधुरता, स्पष्ट उच्चारण और भाव अभिव्यक्ति के आधार पर पांच स्वरूपों का चयन किया गया। इस वर्ष प्रभु श्रीराम की भूमिका के लिए उज्ज्वल मिश्रा का चयन किया गया है। माता सीता के स्वरूप में वैभव मिश्र, भरत के रूप में प्रांजल बाजपेयी, लक्ष्मण के रूप में विक्रम चतुर्वेदी और शत्रुघ्न के रूप में सात्विक शर्मा का चयन हुआ है। चयन प्रक्रिया के दौरान रामलीला समिति के अध्यक्ष अतुलेश उपाध्याय, मंत्री त्रिलोकी सेठ, उपाध्यक्ष डॉ. विकास सिंह, उपमंत्री रोहित मौर्य, कोषाध्यक्ष आर. एन. सिंह, आय-व्यय निरीक्षक पृथ्वी नाथ शर्मा और व्यास उदय शंकर मिश्र सहित अन्य पदाधिकारी व गणमान्य लोग मौजूद रहे।
*गणेश पूजन के बाद शुरू होगा प्रशिक्षण*
चयनित पांचों स्वरूपों का प्रशिक्षण गणेश पूजन के बाद धर्मशाला में शुरू किया जाएगा। रामलीला के पूर्व मंत्री नरेंद्र श्रीवास्तव की देखरेख में बाल स्वरूपों को संवाद, मंच संचालन, भाव-भंगिमा और पारंपरिक अभिनय शैली का प्रशिक्षण दिया जाएगा। शिवपुर रामलीला में अभिनय को केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं बल्कि साधना के रूप में माना जाता है। इसी परंपरा के तहत स्वरूपों को अनुशासित वातावरण में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
*रामचरितमानस की चौपाइयों पर आधारित होती है लीला*
शिवपुर की रामलीला गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पर आधारित है। यहां संवादों का मंचन पारंपरिक शैली में किया जाता है। आयोजन में फिल्मी संगीत या आधुनिक मंचीय प्रभावों का प्रयोग नहीं किया जाता। प्रत्येक प्रसंग का मंचन मानस की चौपाइयों और दोहों के अनुरूप किया जाता है।
*150 वर्ष पुरानी गौरवशाली परंपरा*
शिवपुर रामलीला की परंपरा लगभग 150 वर्ष पुरानी है। बुजुर्गों के अनुसार पहले रामलीला देखने के लिए दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष ट्रेन तक चलाई जाती थी। समय के साथ आयोजन के स्वरूप में बदलाव आया, लेकिन इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी कायम है।शिवपुर की रामलीला आज भी काशी की समृद्ध लोकनाट्य परंपरा और धार्मिक आस्था की अमूल्य धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
