
संत रविदास जयंती विशेष
काशी की पावन धरती पर एक समय महान योगी गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ भ्रमण कर रहे थे। उनकी योग-सिद्धियों की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उसी दौरान उन्हें पता चला कि काशी में एक साधारण चर्मकार, संत रविदास, अपने भजनों और आध्यात्मिक ज्ञान से लोगों के हृदय जीत रहे हैं।गुरु गोरखनाथ के मन में जिज्ञासा जागी। वे संत रविदास की कुटिया पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि रविदास जी फटे-पुराने वस्त्र पहने, जूते बनाने का कार्य करते हुए प्रभु का नाम जप रहे हैं। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज और मन में अपार शांति थी।गुरु गोरखनाथ ने पूछा, “रविदास, तुम दिनभर इस साधारण कार्य में लगे रहते हो। फिर भी लोग तुम्हें संत क्यों कहते हैं? “संत रविदास मुस्कुराए और बोले, “गुरुदेव, यदि कर्म ईश्वर को समर्पित हो जाए, तो वही पूजा बन जाता है। “कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ ने उनकी परीक्षा लेने के लिए अपनी योगशक्ति का प्रदर्शन किया। किंतु संत रविदास शांत भाव से अपने कार्य में लगे रहे। उनके चेहरे पर न आश्चर्य था, न अहंकार। कुछ देर बाद रविदास जी ने अपने पास रखी कठौती (पानी के पात्र) की ओर संकेत करते हुए कहा, “गुरुदेव, योग से चमत्कार मिल सकता है, लेकिन प्रभु तक पहुंचने का मार्ग निर्मल मन और निष्काम भक्ति से ही खुलता है। “लोककथा के अनुसार उसी क्षण गुरु गोरखनाथ को दिव्य अनुभूति हुई। उन्होंने संत रविदास के चरणों में प्रणाम किया और कहा, “जिस सत्य की खोज योग के कठिन मार्ग से होती है, उसे तुमने सहज भक्ति में पा लिया है। “संत रविदास ने विनम्रता से उत्तर दिया, “योग और भक्ति विरोधी नहीं हैं। दोनों का लक्ष्य एक ही है—परमात्मा की प्राप्ति। यदि योग में विनम्रता हो और भक्ति में सेवा, तो साधक निश्चित ही ईश्वर के निकट पहुंच जाता है। “इस प्रसंग का संदेश यह है कि आध्यात्मिक महानता बाहरी वेश, जाति, व्यवसाय या चमत्कारों से नहीं, बल्कि विनम्रता, निष्काम सेवा और ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम से प्राप्त होती है। इसलिए संत रविदास का जीवन आज भी समता, सेवा और भक्ति का अनुपम उदाहरण माना जाता है।
